हजरत मोहम्मद का जीवन चरित्र


हजरत मोहम्मद जी का जीवन चरित्र

यह लेख श्री मुहम्मद इनायतुल्लाह सुब्हानी द्वारा लिखित और नसीम गाजी फलाही द्वारा अनुवादित पुस्तक ‘जीवनी हजरत मुहम्मद’ पर आधारित है।

श्री अब्दुल मुत्तलिब

श्री हाशिम के पुत्र शौबा थे, जिनका नाम बाद में अब्दुल मुत्तलिब पड़ा। जब मुत्तलिब अपने भतीजे शौबा को अपने गाँव लाए, तो लोगों ने सोचा कि वह कोई दास लाए हैं, इसलिए शौबा को अब्दुल मुत्तलिब के नाम से अधिक जाना जाने लगा। अब्दुल मुत्तलिब को दस पुत्र प्राप्त हुए। किसी कारण से उन्होंने अपने दस बेटों में से एक की कुर्बानी अल्लाह के लिए देने का प्रण लिया।

देवता को कौन सा बेटा कुर्बानी के लिए पसंद है, यह जानने के लिए उन्होंने एक मंदिर (काबा) में रखी मूर्तियों में से बड़े देव की मूर्ति के सामने दस तीर रखे और प्रत्येक पर एक पुत्र का नाम लिख दिया। जिस तीर पर सबसे छोटे पुत्र अब्दुल्ला का नाम लिखा था, वह तीर मूर्ति की तरफ हो गया। माना गया कि देवता को यही पुत्र कुर्बानी के लिए स्वीकार है।

श्री अब्दुल्ला (नबी मुहम्मद के पिता) की कुर्बानी की तैयारी होने लगी, जिससे पूरे क्षेत्र में हाहाकार मच गया। वहाँ के धार्मिक लोगों ने अब्दुल मुत्तलिब से ऐसा न करने को कहा। तभी एक पुजारी में कोई अन्य आत्मा बोली। उसने कहा कि ऊँटों की कुर्बानी देने से भी काम चलेगा। इससे राहत मिली। उसी शक्ति ने उन्हें एक अन्य गाँव में एक औरत के बारे में बताया, जो अन्य मंदिरों के पुजारियों की दलाल थी। उस औरत को यह फैसला करना था कि कितने ऊँटों की कुर्बानी से अब्दुल्ला की जान अल्लाह क्षमा करेगा। उस औरत ने कहा कि जितने ऊँट एक जान के लिए देते हो, उसमें दस और जोड़ दो। फिर अब्दुल्ला के नाम की पर्ची तथा दस ऊँटों की पर्ची डालकर जाँच करते रहो। जब तक ऊँटों वाली पर्ची न निकले, तब तक यह करते रहो। इस तरह वे दस-दस ऊँटों की संख्या बढ़ाते रहे। सौ ऊँटों के बाद ऊँटों की पर्ची निकली। इस प्रकार सौ ऊँटों की कुर्बानी देकर बेटे अब्दुल्ला की जान बचाई गई।

जवान होने पर श्री अब्दुल्ला का विवाह भक्तमति आमिनी देवी से हुआ। जब हजरत मुहम्मद माता आमिनी जी के गर्भ में थे, तभी पिता श्री अब्दुल्ला जी की मृत्यु किसी दूर स्थान पर हो गई और वहीं उनकी कब्र बनवा दी गई।

बचपन और विवाह

जब बालक मुहम्मद की आयु छह वर्ष हुई, तो माता आमिनी देवी अपने पति की कब्र देखने गईं। रास्ते में उनकी भी मृत्यु हो गई। इस प्रकार छह वर्षीय बालक मुहम्मद जी यतीम (अनाथ) हो गए। (यह विवरण ‘जीवनी हजरत मुहम्मद’ के पृष्ठ 21-29 और 33-34 पर लिखा है)।

जब हजरत मुहम्मद जी 25 वर्ष के हुए, तो उनका विवाह 40 वर्षीय एक विधवा खदीजा नामक स्त्री से हुआ। खदीजा पहले दो बार विधवा हो चुकी थीं और तीसरी बार हजरत मुहम्मद से उनका विवाह हुआ। वह एक बहुत बड़े धनाढ्य घराने की महिला थीं। (यह विवरण पुस्तक के पृष्ठ 46, 51-52 पर है)।

हजरत मुहम्मद जी को खदीजा जी से तीन पुत्र (कासिम, तय्यब, ताहिर) और चार बेटियाँ प्राप्त हुईं। तीनों पुत्र उनकी आँखों के सामने ही मृत्यु को प्राप्त हुए, केवल चार लड़कियाँ ही शेष रहीं। (पुस्तक के पृष्ठ 64 पर यह विवरण लिखा है)।

जिब्राईल फरिश्ते द्वारा ज्ञान

एक बार प्रभु प्राप्ति की तड़प में हजरत मुहम्मद जी नगर के बाहर एक गुफा में साधना कर रहे थे। वहाँ एक जिब्राईल नामक फरिश्ते ने हजरत मुहम्मद जी का गला घोंट-घोंट कर जबरदस्ती कुरान शरीफ का ज्ञान समझाया। हजरत मुहम्मद जी को डरा-धमका कर अव्यक्त माने जाने वाले प्रभु का ज्ञान दिया गया। उस जिब्राईल देवता के डर से हजरत मुहम्मद जी ने वह ज्ञान याद किया। इस प्रकार मुहम्मद साहेब जी को काल के भेजे फरिश्ते द्वारा इस ज्ञान को जनता में बताने के लिए बाध्य किया गया।

हजरत मुहम्मद जी ने अपनी पत्नी खदीजा जी को बताया कि जब वह गुफा में बैठे थे, तो एक फरिश्ता आया। उसके हाथ में एक रेशम का रूमाल था, जिस पर कुछ लिखा था। फरिश्ते ने उनका गला घोंटकर कहा, “इसे पढ़ो।” उन्हें लगा जैसे उनके प्राण निकलने वाले हैं। जबरदस्ती उन्हें पढ़ाने की कोशिश की गई। ऐसा दो बार हुआ। तीसरी बार फिर कहा, “पढ़ो।” हजरत मुहम्मद जी ने कहा, “मैं अशिक्षित हूँ, मैं क्या पढूँ?” तब उस फरिश्ते ने उन्हें कुरान की एक आयत पढ़ाई। (यह विवरण पुस्तक के पृष्ठ 67-75 और 157-165 पर लिखा है)।

फरिश्ते जिब्राईल ने नबी मुहम्मद जी का सीना चाक किया, उसमें शक्ति भरी और फिर सील दिया। इसके बाद उन्हें एक खच्चर जैसे जानवर पर बैठाकर ऊपर ले गया। वहाँ नबियों की जमात आई, जिनमें हजरत मूसा, ईसा और इब्राहिम जी आदि भी थे, जिन्हें हजरत मुहम्मद जी ने नमाज़ पढ़ाई।

वहाँ हजरत आदम जी भी थे, जो कभी हँस रहे थे और कभी रो रहे थे। जिब्राईल फरिश्ते ने हजरत मुहम्मद जी को बताया कि यह बाबा आदम हैं। रोने का कारण यह था कि बाईं ओर उनकी निकम्मी संतान नरक में कष्ट भोग रही थी, जिसे देखकर वह रो रहे थे। दाईं ओर स्वर्ग में उनकी नेक संतान सुखी थी, जिसे देखकर वह हँस रहे थे। इससे पता चलता है कि बाबा आदम ऊपर के लोक में भी पूर्ण सुखी नहीं थे।

इसके बाद, वे सातवें आसमान पर गए। वहाँ पर्दे के पीछे से आवाज आई कि प्रतिदिन पचास नमाज़ किया करें। वहाँ से पचास नमाज़ों को कम करवाकर केवल पाँच नमाज़ ही अल्लाह से प्राप्त करके नबी मुहम्मद वापस आ गए।

मृत्यु और उत्तराधिकारी

पुस्तक के पृष्ठ 307 से 315 के अनुसार, हजरत मुहम्मद जी ने मुसलमानों से खून-खराबा न करने और ब्याज न लेने के लिए कहा। 63 वर्ष की आयु में वह सख्त बीमार होकर तड़पते-तड़पते भी नमाज़ पढ़ते रहे। घर पर असहनीय पीड़ा में सारी रात तड़प कर उन्होंने प्राण त्याग दिए। (पृष्ठ 319) बाद में उत्तराधिकारी का झगड़ा पड़ा और हजरत अबू बक्र को खलीफा चुना गया।


कबीर साहेब की दृष्टि से हजरत मुहम्मद का जीवन

शेख तकी पीर ने बताया कि अल्लाह तो सातवें आसमान पर रहता है और वह निराकार है। इस पर कबीर जी ने कहा कि शेख जी, एक ओर तो आप भगवान को निराकार कह रहे हो, दूसरी ओर प्रभु को सातवें आसमान पर एक देशीय सिद्ध कर रहे हो। जब परमात्मा सातवें आसमान पर रहता है, तो वह साकार हुआ।

शेख तकी से हजरत मुहम्मद साहेब जी का जीवन परिचय सुनकर परमेश्वर कबीर साहेब जी ने कहा, “शेख तकी जी, आपने बताया कि हजरत मुहम्मद जी जब माता के गर्भ में थे, तब उनके पिता श्री अब्दुल्ला जी की मृत्यु हो गई। छह वर्ष के हुए तो माता जी की मृत्यु हो गई। आठ वर्ष के हुए तो दादा अब्दुल मुत्तलिब चल बसे। यतीमी का जीवन जीते हुए उनकी 25 वर्ष की आयु में शादी दो बार पहले विधवा हो चुकी 40 वर्षीय खदीजा से हुई। तीन पुत्र तथा चार पुत्रियाँ संतान रूप में हुई, लेकिन तीनों पुत्र (कासिम, तय्यब तथा ताहिर) उनकी आँखों के सामने ही चल बसे।

“विचार करें, जिस अल्लाह के भेजे रसूल (नबी) के जीवन में कहर ही कहर रहा, तो अन्य अनुयायियों को कुरान शरीफ व मजीद में वर्णित साधना से क्या लाभ हो सकता है? हजरत मुहम्मद 63 वर्ष की आयु में दो दिन असहाय पीड़ा के कारण दर्द से बेहाल होकर मृत्यु को प्राप्त हुए। जिस पिता के सामने तीनों पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो जाएँ, उस पिता को आजीवन सुख नहीं होता। प्रभु की भक्ति इसीलिए करते हैं कि परिवार में सुख रहे और कोई पाप कर्म का दंड टल जाए। आप के अल्लाह द्वारा दिया गया भक्ति ज्ञान अधूरा है। इसीलिए सूरत फुर्कानि 25 आयत 52 से 59 तक में कहा है कि जो गुनाहों को क्षमा करने वाला कबीर नामक अल्लाह है, उसकी पूजा विधि किसी तत्वदर्शी (बाखबर) से पूछ देखो। कबीर परमेश्वर ने कहा, “शेख तकी, मैं स्वयं वही कबीर अल्लाह हूँ। मेरे पास पूर्ण मोक्षदायक, सर्व पाप नाशक भक्ति विधि है।”

बाबा आदम की स्थिति

शेख तकी जी ने बताया कि सब मनुष्यों का पिता हजरत आदम ऊपर आसमान पर (जहाँ जिब्राईल फरिश्ता हजरत मुहम्मद को लेकर गया था) कभी रो रहा था, कभी हँस रहा था, क्योंकि उसकी निकम्मी संतान नरक में कष्ट उठा रही थी और अच्छी संतान स्वर्ग में सुखी थी।

यह विचार करने योग्य है कि पवित्र ईसाई धर्म और पवित्र मुसलमान धर्म के प्रमुख बाबा आदम ने जो साधना की, उसके प्रतिफल में वे जिस लोक में पहुँचे हैं, वहाँ पर भी चैन से नहीं रह रहे। इस पृथ्वी पर भी बाबा आदम दुःखी ही रहे, क्योंकि उनके दोनों पुत्रों में राग-द्वेष भरा था, जिस कारण बड़े भाई ने छोटे की हत्या कर दी। सैकड़ों वर्षों बाद बाबा आदम को एक पुत्र हुआ, जिससे भक्ति मार्ग चला। जिस पिता के दोनों पुत्र ही बिछड़ जाएँ, वह सुखी नहीं हो सकता। यही दशा बाबा आदम जी की हुई थी। सैकड़ों वर्ष दुख झेलने के बाद एक नेक पुत्र प्राप्त हुआ। फिर बाबा आदम उस लोक में भी इसी कष्ट को झेल रहे हैं। सभी नबी जो पहले पृथ्वी पर अल्लाह के भेजे आए थे, वे (हजरत ईसा, हजरत अब्राहिम, हजरत मूसा आदि) भी उसी स्थान (लोक) में अपनी साधना से पहुँचे।

वास्तव में वह पित्तर लोक है, जहाँ अपने-अपने पूर्वजों के पास चले जाते हैं। इसी प्रकार हिन्दुओं का भी ऊपर वही पित्तर लोक है। जिनका संस्कार पित्तर बनने का होता है, वह पित्तर योनि धारण करके उस पित्तर लोक में रहता है। फिर पित्तर वाला जीवन भोगकर फिर भूत तथा अन्य पशु-पक्षियों की योनियों को भी भोगता है। यह तो पूर्ण मोक्ष तथा सुख प्राप्ति नहीं हुई। तो वर्तमान के अन्य साधकों को क्या उपलब्धि होगी?

पवित्र बाईबल में लिखा है कि हजरत आदम के काईन तथा हाबिल दो पुत्र थे। काईन खेती करता था और हाबिल भेड़-बकरियाँ पालता था। एक दिन काईन अपनी पहली फसल का कुछ अंश प्रभु के लिए ले गया, जिसे प्रभु ने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि काईन का दिल साफ नहीं था। हाबिल अपने भेड़ का पहला मेमना (बच्चा) भेंट के लिए लेकर गया, जिसे प्रभु ने स्वीकार कर लिया। इस बात से काईन क्रोधित हो गया। वह अपने छोटे भाई हाबिल को बहकाकर जंगल में ले गया, जहाँ उसकी हत्या कर दी। प्रभु ने काईन से पूछा, “तेरा भाई कहाँ गया?” काईन ने कहा, “मैं क्या उसके पीछे-पीछे फिरता हूँ? मुझे क्या मालूम?” तब प्रभु ने कहा कि तूने अपने भाई के खून से पृथ्वी को रंगा है। अब मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू रोजी के लिए भटकता रहेगा।

विचार करें: जहाँ से दोनों पवित्र धर्मों (मुसलमान तथा ईसाई) के पूर्वज मुखिया की जीवनी प्रारंभ होती है, वहीं से हृदय विदारक घटनाएँ प्रारंभ हो गईं। वास्तव में हजरत आदम के शरीर में कोई पित्तर आकर प्रवेश करता था। वही माँस खाने का आदी होने के कारण पवित्र आत्माओं को गुमराह करता था कि अल्लाह (प्रभु) को भेड़ के बच्चे की भेंट स्वीकार है। उसी ने दोनों भाइयों का झगड़ा करा दिया और हजरत आदम जी के परिवार को बर्बाद कर दिया।

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